सपेरा
आज शाम को, स्टेशन के पास यूँही घूम रहा था..
वहीं किनारे, एक सपेरा खेल दिखा रहा था,
वही खेल, पेट का सवाल और महंगाई..
ढ़ेर सारी बातें और साँप की लड़ाई,
मैं भी खड़ा हो कर, खेल एन्जॉय करने लगा..
और थोड़ी देर में वो सपेरा डरने लगा,
मैंने पूछा, 'क्या हुआ? तू क्यों ड़र रहा है..
बता मुझे, क्यों तू ख़ेल समेट रहा है?'
वो बोला, 'नहीं बाबूजी..
कोई साँप मुझे क्या डरायेगा??
देखो, डंडा घुमाते हवलदार आ रहा है..
बस वही मुझे भगायेगा..'
-Purushottam
वहीं किनारे, एक सपेरा खेल दिखा रहा था,
वही खेल, पेट का सवाल और महंगाई..
ढ़ेर सारी बातें और साँप की लड़ाई,
मैं भी खड़ा हो कर, खेल एन्जॉय करने लगा..
और थोड़ी देर में वो सपेरा डरने लगा,
मैंने पूछा, 'क्या हुआ? तू क्यों ड़र रहा है..
बता मुझे, क्यों तू ख़ेल समेट रहा है?'
वो बोला, 'नहीं बाबूजी..
कोई साँप मुझे क्या डरायेगा??
देखो, डंडा घुमाते हवलदार आ रहा है..
बस वही मुझे भगायेगा..'
-Purushottam
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