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सपेरा

आज शाम को, स्टेशन के पास यूँही घूम रहा था.. वहीं किनारे, एक सपेरा खेल दिखा रहा था, वही खेल, पेट का सवाल और महंगाई.. ढ़ेर सारी बातें और साँप की लड़ाई, मैं भी खड़ा हो कर, खेल एन्जॉय करने लगा.. और थोड़ी देर में वो सपेरा डरने लगा, मैंने पूछा, ' क्या  हुआ ? तू क्यों  ड़र  रहा है.. बता मुझे, क्यों तू  ख़ेल   समेट  रहा है?' वो बोला, ' नहीं बाबूजी.. कोई   साँप  मुझे क्या डरायेगा?? देखो, डंडा घुमाते  हवलदार  आ रहा है.. बस  वही मुझे भगायेगा..' -Purushottam

और तुम

एक   आस , एक   एहसास .. मेरी  प्यास , और   तुम .. एक   सवाल , तुम्हारा  ख्याल .. थोड़ा  बवाल , और   तुम .. एक   बात , एक   रात .. तुम्हारा  साथ , और   तुम .. एक   दुआ , एक   फ़रियाद .. तुम्हारी  याद , और   तुम .. मेरा  वजूद , मेरा  जुनून .. मेरा  सुकून , और   तुम .. सिर्फ़   तुम  ! -Purushottam

मेरी आँखें

मेरी आँखें  मेरी आँखें खरीदोगे.. ?? बोहोत   मजबूर   हालात  में मुझे  नीलाम  करनी हैं.. कोई  मुझे  नगद  ही दे-दे, मैं थोड़े  दाम  ले लूंगा जो मिले, पहली बोली उसी के  नाम   कर  दूंगा.. मुझे  बाज़ार  वाले  कह  रहे हैं  कम   अक़्ल  हो  तुम  ! सुनो लोगों.. नहीं हूं मैं,  कोई   हिज्र  का  ख़्वाब .. नफ़ा  और   नुकसान  का  शतरंज  नही मैं खेलने आया.. बड़ी  मेहबूब  हैं, मुझको ये मेरी  नम  आँखे.. मग़र   अब  बेचता हूँ के, मैंने  एक   ख़्वाब  देखा था.. उसे अपना बनाने का.. उसे  दिल  मे बसाने का.. मुझे  उस   ख़्वाब  का जुर्माना भरना है.. अब   बस  इन्हें  नीलाम  करना है। -Purushottam

Koi Khaas Nahi..

Koi tere  कोई  तेरे से पूछे,  कौन  हूँ मैं? तो  बोल  देना,  कोई   खास  नही.. एक   दोस्त  है, कच्चा-पक्का सा एक   झूठ  है, आधा सच्चा सा.. जज़्बात  को ढँके,  एक   सफ़ेद  पर्दा पूरा नही है,  बस  हिस्सा मेरा आधा.. बस   एक  बहाना, अच्छा सा हो  कर  बे-गाना, लगे अपना सा.. दीवाना है, थोड़ा  पाग़ल  सा जान   कर  भी, अनजाना सा. ज़िन्दगी का, ऐसा साथी है जो  दूर  ना हो  कर ,  पास  भी नहीं.. कोई  तेरे से पूछे,  कौन  हूँ मैं बस .. वही कहना,  कोई   खास  नही !! -  पुरुषोत्तम